जर्मनी के एक बेहद घने और खौफनाक जंगल के किनारे एक गरीब लकड़हारा अपनी दूसरी पत्नी और दो मासूम बच्चों के साथ रहता था। लड़के का नाम हेंसल था और लड़की का नाम ग्रेटल। उस साल पूरे देश में भयंकर अकाल पड़ा था। घर में अन्न का एक दाना तक नहीं बचा था।
एक सर्द रात, जब बच्चे भूख से करवटें बदल रहे थे, सौतेली माँ ने लकड़हारे से फुसफुसाते हुए कहा, "कल सुबह हम बच्चों को जंगल के सबसे घने हिस्से में ले जाएंगे। उनके हाथ में रोटी का एक-एक टुकड़ा देंगे और आग जलाकर उन्हें वहीं छोड़ आएंगे। हमारे पास उन्हें खिलाने के लिए कुछ नहीं है। वे अपना रास्ता खुद ढूंढ लेंगे, वरना हम सब भूख से मारे जाएंगे।"
पिता का दिल टूट गया, लेकिन पत्नी की ज़िद के आगे उसे झुकना पड़ा। दूसरे कमरे में लेटे हेंसल ने यह खौफनाक साज़िश सुन ली। ग्रेटल सिसक-सिसक कर रोने लगी। हेंसल ने अपनी बहन के आँसू पोंछे और कहा, "डरो मत ग्रेटल, मैं कोई न कोई रास्ता निकाल लूँगा।" जब सब सो गए, हेंसल चुपके से घर से बाहर निकला। चाँद की रोशनी में आँगन में पड़े सफेद पत्थर मोतियों की तरह चमक रहे थे। हेंसल ने अपनी जेबें उन सफेद पत्थरों से भर लीं।
अगली सुबह सूरज उगने से पहले ही सौतेली माँ ने उन्हें उठाया। जंगल के रास्ते पर चलते हुए हेंसल बार-बार पीछे मुड़ता और चुपके से एक सफेद पत्थर ज़मीन पर गिरा देता। जंगल के बीचों-बीच पहुँचकर पिता ने लकड़ियाँ जलाईं और कहा, "तुम दोनों यहाँ आराम करो, हम लकड़ियाँ काटकर लौटेंगे।" लेकिन वे कभी नहीं लौटे। जब रात का घुप्प अंधेरा छा गया और भयानक जानवरों की आवाज़ें आने लगीं, ग्रेटल रो पड़ी। लेकिन हेंसल ने कहा, "बस चाँद के निकलने का इंतज़ार करो।" जैसे ही चाँद निकला, ज़मीन पर पड़े सफेद पत्थर चमकने लगे। उन्हीं पत्थरों के सहारे दोनों बच्चे सुबह होते-होते अपने घर वापस पहुँच गए।
सौतेली माँ उन्हें देखकर आग-बबूला हो गई। कुछ दिनों बाद, जब फिर से भुखमरी की नौबत आई, तो उसने रात में दरवाज़े पर ताला लगा दिया ताकि हेंसल पत्थर न बीन सके। अगली सुबह जब उन्हें दोबारा जंगल ले जाया जा रहा था, तो हेंसल ने अपनी जेब में रखी रोटी के छोटे-छोटे टुकड़े (Breadcrumbs) रास्ते में गिराने शुरू कर दिए।
उन्हें जंगल के उस हिस्से में छोड़ दिया गया जहाँ दिन में भी सूरज की रोशनी नहीं पहुँचती थी। रात होने पर हेंसल ने कहा, "मैंने रोटी के टुकड़े गिराए हैं, हम वापस चले जाएंगे।" लेकिन जब उन्होंने चाँद की रोशनी में ज़मीन पर देखा, तो वहाँ कुछ नहीं था। जंगल के भूखे पक्षी वे सारे टुकड़े खा चुके थे!
अब वे सच में खो चुके थे। वे तीन दिन तक उस डरावने जंगल में भटकते रहे। भूख और थकान से उनकी जान निकल रही थी। तभी अचानक, पेड़ों के बीच उन्हें एक अद्भुत नज़ारा दिखा।
वहाँ एक छोटा सा घर था। लेकिन यह कोई साधारण घर नहीं था! पास जाकर ग्रेटल की आँखें फटी की फटी रह गईं। उस घर की दीवारें जिंजरब्रेड (Gingerbread) से बनी थीं, छत पर स्वादिष्ट केक बिछा था, और खिड़कियाँ साफ, मीठी चीनी की थीं! भूख से तड़प रहे बच्चे दौड़ पड़े। हेंसल ने छत का एक टुकड़ा तोड़ा और ग्रेटल खिड़की का शीशा (चीनी) चाटने लगी। उस मीठे स्वाद ने उनकी सारी थकान मिटा दी।
तभी अंदर से एक बहुत ही खुरदरी और डरावनी आवाज़ आई: "मेरे घर को कौन कुतर रहा है?" दरवाज़ा खुला और एक बेहद बूढ़ी, झुर्रियों वाली औरत बैसाखी के सहारे बाहर आई। उसकी आँखें लाल थीं और उसे ठीक से दिखाई नहीं देता था, लेकिन उसकी सूंघने की शक्ति जानवरों जैसी तेज़ थी। उसने बड़ी मीठी आवाज़ में कहा, "अरे मासूम बच्चों! तुम कितने भूखे हो। अंदर आओ, मैं तुम्हें पैनकेक, सेब और दूध दूँगी।"
बच्चों को लगा जैसे उन्हें कोई फरिश्ता मिल गया हो। लेकिन उन्हें नहीं पता था कि वह कोई दयालु बुढ़िया नहीं, बल्कि बच्चों का मांस खाने वाली एक खूंखार चुड़ैल थी! वह मीठे घर का लालच देकर बच्चों को फंसाती थी।
अगली सुबह चुड़ैल का असली रूप सामने आ गया। उसने अपने कठोर हाथों से हेंसल को पकड़ा और एक लोहे के पिंजरे में बंद कर दिया। फिर उसने ग्रेटल को झकझोर कर उठाया और चिल्लाई, "उठो आलसी लड़की! अपने भाई के लिए अच्छा-अच्छा खाना बनाओ। जब वह मोटा और ताज़ा हो जाएगा, तब मैं उसे भूनकर खाऊँगी!"
महीनों बीत गए। हर सुबह चुड़ैल पिंजरे के पास आती और अपनी अंधी आँखों की वजह से हेंसल से कहती, *"अपनी उंगली बाहर निकालो, मैं देखूँ कि तुम कितने मोटे हुए हो।"लेकिन हेंसल बहुत चालाक था। वह उंगली की जगह पिंजरे में पड़ी एक सूखी हड्डी बाहर निकाल देता। चुड़ैल उसे टटोलती और सोचती, "यह लड़का इतना खाना खाकर भी इतना कमज़ोर क्यों है?" आखिरकार चुड़ैल का धैर्य टूट गया। उसने चिल्लाते हुए ग्रेटल से कहा, "हेंसल मोटा हो या पतला, कल मैं उसे खा जाऊँगी! जा और ओवन (भट्टी) में आग जला!" ग्रेटल रोते हुए आग जलाने लगी।
कुछ देर बाद चुड़ैल आई और बोली, "ज़रा अंदर घुसकर देख कि क्या भट्टी इतनी गर्म हो गई है कि मैं उसमें ब्रेड सेंक सकूँ?" चुड़ैल की साज़िश ग्रेटल को ओवन में धकेलने की थी। लेकिन ग्रेटल समझ गई। उसने मासूमियत का नाटक करते हुए कहा, "मुझे नहीं पता अंदर कैसे जाते हैं? क्या आप मुझे करके बताएंगी?"
चुड़ैल झुंझलाई, "मूर्ख लड़की! ऐसे जाते हैं..." और जैसे ही चुड़ैल ने अपना सिर और आधा धड़ धधकती हुई भट्टी के अंदर डाला, ग्रेटल ने अपनी पूरी ताकत लगाकर चुड़ैल को अंदर धक्का दे दिया और बाहर से लोहे का भारी दरवाज़ा बंद करके कुंडी लगा दी! अंदर से चुड़ैल की चीखें गूंज उठीं और कुछ ही पलों में वह जलकर खाक हो गई।
ग्रेटल दौड़कर गई और हेंसल को आज़ाद कर दिया। दोनों भाई-बहन खुशी से गले मिले। जब उन्होंने चुड़ैल के घर की तलाशी ली, तो उन्हें संदूकों में भरे हुए बेशकीमती हीरे और मोती मिले। उन्होंने अपनी जेबें मोतियों से भर लीं और जंगल से बाहर निकलने का रास्ता खोज लिया।
जब वे घर पहुँचे, तो उनके पिता उन्हें देखकर फूट-फूट कर रोने लगे। पिता ने बताया कि उनकी ज़ालिम सौतेली माँ मर चुकी है और वे उनके बिना एक पल भी चैन से नहीं रह पाए। बच्चों ने हीरे-मोती मेज़ पर रख दिए। अब उनकी गरीबी और दुख हमेशा के लिए खत्म हो चुके थे और वे खुशी-खुशी एक साथ रहने लगे।
संस्कृति की झलक:
'हेंसल और ग्रेटल' की यह अमर कथा जर्मनी के मशहूर 'ब्रदर्स ग्रिम' (Brothers Grimm) ने 1812 में संकलित की थी। यह कहानी मध्ययुगीन यूरोप के उस भयानक दौर को दर्शाती है जब अकाल (Famine) पड़ने पर लोग इतने हताश हो जाते थे कि अपने ही बच्चों को पालने में असमर्थ होते थे। कहानी में मौजूद 'जिंजरब्रेड का घर' बच्चों के सबसे बड़े सपने और लालच का एकदम सटीक मनोवैज्ञानिक प्रतीक है।
कहानी से सीख:
यह कहानी सिखाती है कि बाहरी सुंदरता या मीठी चीज़ों पर तुरंत भरोसा नहीं करना चाहिए, क्योंकि लालच मौत का जाल भी हो सकता है। साथ ही, मुश्किल से मुश्किल समय में अगर भाई-बहन एक-दूसरे का साथ दें और सूझबूझ से काम लें, तो वे किसी भी बड़े राक्षस या परिस्थिति को हरा सकते हैं।
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